इक-तरफ़ा मोहब्बत

देखने से डरता हूँ तुझको, कि कहीं तेरी आँखों में इनकार न देख लूं
इज़हार की चाहत को समेटे हुये, मैं खुद को यूं बे-आबरु होते न देख लूं।।
तेरी हाफ़िज़ा से भरे दिल में आज महशर के आने की खामोशी सी हैं
इक-तरफ़ा होने कि तोहमत में आज, मेरी अज़ल सी मोहब्बत को यूं डुबते ना देख लूं।

Manoj bohra
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