कलयुग

ये दौर है कलयुग का जनाब,
यहां सच्चाई की बात ना करो...
हर जगह झूठ की ही मुहर है
सच की वहां कोई औकात नहीं है
ज़िन्दगी के किरदार है झूठे
उसपर अच्छाई के रंगीन मुखवटे

ये दौर है कलयुग का जनाब,
रिश्तों का यहां बात ना करो...
खोंख़ले रिश्तों में बस कड़वाहट और दरारे है
क्योंकि बस मतलब का वहां राज है
मत निकलो करने को दूंसरो का भला
इन्सानियत भी जहां पर बोझ है

ये दौर है कलयुग का जनाब,
यहां जमीर की बात ना करो...
ये पैसेवालो की जेब में रहता है
शोर यहां शोहरथ करती है
इज्ज़त बस दौलत को मिलती है

ये दौर है कलयुग का जनाब,
यहां न्याय की बात ना करो
मिलती है उसे तारीख पे तारीख
जो निकल पड़ा है न्याय पाने
साबित भी वही है गुनहगार
क्योंकि यहां कातिल घूमें खुली सड़कपर

ये दौर है कलयुग का जनाब,
यहां इश्क़ की बात ना छेड़ो...
इश्क़ यहां एक से नहीं हज़ारों से होता है
मोहब्बत के बाज़ार में जिस्मों का व्यापार है
ईमानदारी की धज्जियां उड़ाकर
यहां बेईमानी की सौदेबाजी चलती है


ये दौर है कलयुग का जनाब,
यहां धर्म की बात ना करो
जहां एक मजहब दूसरे से बड़ा है
पाप भी कहा नीचे खड़ा है
क्योंकि पुण्य का भरा यहां घड़ा है

ये दौर है कलयुग का जनाब,
यहां नारी सम्मान की बात ना करो
बुरे आचरण वाले तेरा है यहां मान
होगा हर रोज नारी का चीरहरण
हर इंसान में मिलेगा जहां दुशासन

Samiksha Shirsath
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