वृद्धाश्रम

लाया था उठाकर अपने दो हाथों में,
सजाया फुर्सत से फिर उसे बातों में,
अपने वक्त से मोहलत मांग कर,
उसका वक्त सजाया था,
खुदको मिटाकर आहिस्ते आहिस्ते,
उसे बखूबी बनाया था।

इन बेजान हाथों में, तब जोश भरा था,
देख खुशी उस चेहरे पर, मैं मदहोश बड़ा था।
खून पसीने की मेहनत, सब कुर्बान था कुर्बान,
उसे खिलखिलाता देख, आती जान में जान।

मैंने घर बनवाया था, थोड़े पैसे जोड़ जोड़कर,
कुछ मुकम्मल किया था, कुछ तोड़ तोड़कर।
बड़ा नहीं था मग़र आलीशान था ज़रूर,
वो निर्जीव हम तीनों की पहचान था ज़रूर।

मग़र धीरे धीरे समय के मार से,
खट्टे मीठे लफ़्ज़ों के तकरार से,
आज सिंकुड़ गया शायद, वो महल मेरे जज़्बातों का,
सारे कर्ज़ अदा कर चुका, शायद मेरे हालातों का।
बड़ा घर था मग़र जगह थोड़ी छोटी थी शायद,
तभी वो मुझे खुद में समा ना सका,

मेरा तस्वीर अंतर्मन में बना ना सका।

मेरे जिस उंगली को थामकर खड़ा हुआ था पहली दफ़ा,
आज छोड़ गया बृद्धाश्रम में वही उँगली थामे हुए,
कलम थमाया था मैं, आज दस्तखत कर गया,
सियाही को कलम से हटाकर, आज हद कर गया।
मेरा अंश है ना वो, मग़र मुझे अपना अंश
मानता नहीं अब शायद वो,
बीवी बच्चों में मशरूफ, मुझे पहचानता नहीं
अब शायद वो।
सुना है तक़लीफ़ होती है मेरे होने से अब उन्हें,
बोझ सा बन गया हूँ, ऐसा लगता है अब उन्हें।
फ़रमाइश न जाने किसकी थी, मुझे बेदख़ल करने में,
मुझे मेरे कुटिया से निकालने में, उसे बेअक्ल करने में।
घनटों बिताये थे जिसके माथे को सहलाते हुए,
आज मिनटों में बता गया उन घन्टों की कीमत।

मैंने कुछ कागज़ फाड़कर जेब में रख लिया,
न जाने कब ख़त लिखने की ज़रूरत पड़ जाए,
इस बूढ़े दिल में उस जवान के प्रती प्रेम उमड़ आए।
शायद ज़िन्दगी के कुछ किस्से मुझे यहीं लिखने होंगे,
कुछ पड़ाव चुनौतियों के अब यहीं सीखने होंगे,
अब इंतेज़ार करूँगा मैं भी उसका
खिड़की पर सर रखकर,
जैसे कभी वो किया करता था मेरा इंतेज़ार
सुनसान राहों में नज़र रखकर।

दौड़ कर आता पास और गले लगा लेता,
मानो उसका सबसे प्यारा खिलौना हूँ मैं।
खेल गया सच में आज मुझे खिलौना करके,
आज चैन की नींद सोया होगा,
मेरा बाहर बिछौना करके।

अब फुर्सत में हूँ मैं, काश फिर से दौड़ कर आये,
और गले लगाले, पहले की तरह,
कहे की गलती हो गई, माफ कर दो,
और मुस्कान सजाले, पहले की तरह।
मग़र उम्मीद तो शिर्फ़ उम्मीद ही बनी रह जाती है,
किस्मत के लिखावट हर बार तनी रह जाती है,
खैर अब उससे नफरत भी तो नहीं कर सकता,
उसे बद्दुआ देकर, मैं चैन से नहीं मर सकता।
मग़र हाँ, उपर जाकर अपना दर्द सुनाऊँगा ज़रूर,
उस किस्मत लिखने वाले को डाँतुंगा, बताउँगा ज़रूर।
बिन गुनाह के ही मुझे इस कदर सज़ा दे दिया,
खून आज खून को बेझिझक दग़ा दे दिया।

कासिम क्रेस्टफॉलेन
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