श्रद्धांजलि

लिखने को लिख लेता हूं मैं..
पर मैं कोई कवि नहीं हूं,
ना ही महान विचारो की छवि हूं।

मैं कोई शायर भी नहीं,
और समाजकंटको से डर जाऊ, ऐसा कायर भी नहीं।

इरफ़ान सर आज सुपुर्द-ए-खाक हो गए
इस गमगीन मौके पर मेरे शब्द कुछ हद्द तक बेबाक हो गए।

उनके इंतेकाल से पूरे देश की आंखो में नमी है।
धर्म के ठेकेदारो , ज़रा देखो, हिन्दुओं की आंखो में कहां ही आंसुओ कि कोई कमी है?

धर्म के नाम पर आग लगाने से जो एक पल को भी नहीं कतराते हैं।
समझ नहीं आता वो लाशों के ढेरों पर कौन सा निहित स्वार्थ चाहते हैं?

आग चाहे कोई भी लगाए
खून हमारे भाईयो का ही बहता है।
इन जख्मों का दर्द समृद्ध इतिहास वाला पूरा भारत वर्ष सहता है।

जिनके नाम पर यह सब होता है
उन पैगम्बर और नारायण कि आंखें भी झुक जाती होंगी,
जब उनके नाम पे किसी निरपराध की सांसें रुक जाती होंगी।

आज इस मुसीबत के समय में पूछ कर देखिए साहेब!
रोटी, कपड़ा और चारदिवारी का ईमान है,
फ़िर चाहे हो मंदिर की घंटी या मस्जिद की आज़ान है।

जानते हुए सब कुछ, मूक दर्शक बन कर देख रहे हैं।
लगता है द्वेस्था कि आग में मजबूती के सारे स्तंभ भी ढा गए हैं!

इरफ़ान सर से नहीं हम कसाब से नफ़रत करते हैं,
हम क्यों नहीं याद रखते, सीमा की रक्षा में मुस्लिम भाई भी मरते हैं?!

सच्ची श्रदधांजलि देना चाहते हो तो, सिर्फ सोशल मीडिया पर पोस्ट या स्टोरी मत डालिए, अपने अंदर से वो नफ़रत के बीज भी निकालिए...

लिखने को मन में है अभी काफ़ी
पर अब अपने शब्दो को यही विराम देता हूं,
सबके चहेते इरफ़ान सर को जन्नत में आराम देता हूं ।

जरुरत पड़ी तो कलम उठा फ़िर भारत की कड़वी सच्चाई लिख दूंगा,
अगर कोई दूसरा इरफ़ान मिला तो उनकी भी अच्छाई लिख दूंगा।

Nirmal Chand
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