The Voice of Soul

बन कर आया था मुसाफ़िर यहां, जग को मैंने घर समझा
दोष किसको दूँ इसका मैं, जब खुद को मैंने नश्वर समझा!!
समय का चक्र चलता रहा, शरीर भी साथ मैं गलता रहा
मैं हर क्षण शुन्य बना उसके हर एक रुप में ढला!!
मौत ने जब दस्तक दी, देखकर मैं उसको डरा
जतन मैंने हजार किये पर उस पर मेरा बस ना चला!!
छोड़ दिया उस देहं को, जिसको मैंने अपना समझा
जल रहा है आग में वो, जिसने मुझको नश्वर समझा!!
वक्त हो गया है अब मेरा फिर से घर को लौट आने का विश रूपी जीवन को जी कर फिर से अमृत को पाने का!!

Manoj Bohra
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