Ved ka Taara

कई बार इन राहों मे भटकते हुए
मैं वेद सी हो जाती हूँ
वेद जो तलाश रहा है अपनी तारा को
वेद की तारा।
जानते हो क्या ख़ास है
वेद की तारा में
जिस तरह रातों में
भटके मुसाफ़िरों को राह दिखाता है
ध्रुव तारा
बिल्कुल उसी तरह
इस दुनिया की दौड़ में
भागते, दौड़ते खोए से
वेद को आइना दिखाती है तारा
वो आइना जिसे वेद देख कर भी
देखना नही चाहता
वो आइना जो वेद को वेद की याद
दिलाता है
पर ये वेद उस वेद से मिलना नही चाहता
इस लिए वो तोड़ देना चाहता है
ये आइना
और हर वो रिश्ता
जो इस वेद को उस वेद की याद दिलाए
क्योंकि ये याद उसके सीने में
एक अजीब सा दर्द पैदा करती है
वो दर्द जिसे
कहना उतना ही मुश्किल है
जितना उसे सहना।
पर इस बार ज़ख़्म गहरा है
वेद चुप चाप नहीं सहता
वो ज़ख़्म से रिस्ते लहु की स्याही बना
अपने दर्द की कलम से
लिख़ता है एक कहानी
उसकी अपनी कहानी
वेद की कहानी।
कविता ख़त्म हुई तो मैने सोचा मुझे कब मिलेगी
मेरी तारा जो मेरा हाथ पकड़ खींच कर इन अँधेरों
से बाहर ले जाए मुझे
मैने उठ कर ख़िड़की से पर्दा हटाया
ठीक सामने आसमान में नज़र आया
ध्रुव तारा
मैने मन ही मन सोचा
शायद अब इंतजार ठीक नहीं
शाम ढल रही है
अब तलाश बाहर नही
अंदर ही करनी होगी
शायद मेरी तारा मुझमे ही कहीं होगी।

Nanda
By 
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